Tuesday, December 3, 2019

मिली हवाओं में उड़नें की वो सज़ा यारो


मिली हवाओं में उड़नें की वो सज़ा यारो
कि मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो
वो बे-ख़याल मुसाफ़िर मैं रास्ता यारो
कहाँ था बस में मेरे उस को रोकना यारो
मिरे क़लम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी
कि अपने बारे में कुछ भी लिख सका यारो
तमाम शहर ही जिसकी तलाश में गुम था
मैं उसके घर का पता किस से पूछता यारो
जो बे-शुमार दिलों की नज़र में रहता था
वो अपने बच्चों को इक घर दे सका यारो
जनाब--'मीर' की ख़ुद-गर्ज़ियो के सदक़े में
मियाँ 'वसीम' के कहने को क्या बचा यारो
: वसीम बरेलवजी 

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