Tuesday, November 29, 2016

प्यार

प्यार कभी एकतरफा होता है न होगा 
कहा था मैंने 
दो रूहों की एक मिलन की जुड़वां पैदाइश है यह 
प्यार अकेला जी नहीं सकता 
जीता है तो दो लोगों में 
मरता है तो दो मरते हैं 

प्यार एक बहता दरिया है 
झील नहीं की जिसको किनारे बाँध के बैठे रहते हैं 
सागर भी नहीं की जिसका किनारा होता नहीं 
बस दरिया है और बहता है 
दरिया जैसे चढ़ जाता है , ढल जाता है 
चढ़ना ढालना प्यार में वो सब होता है 
पानी की आदत है ऊपर से नीचे की जानिब बहना 
नीचे से फिर भागती सूरत ऊपर उठाना 
बादल बन आकाश में बहना 
कांपने लगता है जब तेज़ हवाएं छेड़ें
बूँद बूँद बरस जाता है 

प्यार एक जिस्म के साज़ पे बहती गुंज नहीं है 
न मंदिर की आरती है न पूजा है 
प्यार नफा है न लालच है 
न लाभ न हानि कोई 
प्यार ऐलान है अहसान है न कोई जंग की जीत है यह 
न ही हुनर है न ही इनाम न रिवाज़ न रीत है यह 
यह रहम नहीं यह दान नहीं 
यह बीज नहीं जो बीज सके 
खुशबू है मगर यह खुशबू की पहचान नहीं 

दर्द दिलासे शक विश्वास जूनून और होश -ओ -हवास की एक अहसास के कोख से 
पैदा हुआ है 
एक रिश्ता है यह 
यह सम्बन्ध है -
दो जानो का दो रूहों का पहचानों का 
पैदा होता है बढ़ता है यह 
बूढा होता नहीं 

मिटटी में पले एक दर्द की ठंडी धुप तले
जड़ और तर की फसल 
कटती है 
मगर यह बंटती नहीं 
मट्टी और पानी और हवा कुछ रौशनी और तारीकी कुछ 
जब बीज की आँख में झांकते हैं 
तब पौधा गर्दन ऊंची करके 
मूंह नाक नज़र दिखलाता है 
पौधे के पत्ते पत्ते पर कुछ प्रश्न भी है उत्तर भी 

किस मिटटी की कोख थी वोह 
किस मौसम ने पाला पोसा 
और सूरज का छिडकाव किया 
की सिमट गयीं शाखें उसकी 

कुछ पत्तों के चेहरे ऊपर हैं 
आकाश की जानिब तकते हैं 
कुछ लटके हुए हैं 
ग़मगीन मगर 
शाखों की रगों से बहते हुए पानी से जुड़े हैं 
मट्टी के तले एक बीज से आकर पूछते हैं -

हम तुम तो नहीं 
पर पूछना है -
तुम हमसे हो या हम तुमसे 

प्यार अगर वो बीज है तो 
एक प्रश्न भी है 
एक उत्तर भी !
: गुलजार 


Tuesday, November 22, 2016

शून्य

कमी अनेकाहूनि मजपाशी 
     यात मनाला खेद 
कित्येकाहुनी अधिक असे पण 
     मनास याचा मोद 

या मोदाचा त्या खेदाशी 
     होतो भागाकार 
संभावित मज समाधान हे 
     मिळते शून्याकार !

: शून्य  
: हिमरेषा 
: कुसुमाग्रज 

गुलाब

जन म्हणती की -
काट्यावाचून 
गुलाब नाही 
   दिसावयाचा -
एकही काटा या कुसुमाला 
   कोठे नाही 
दलादलांतुनि दहिवर केवळ 
   साठूनि राही -
म्हणून म्हणतो -
अश्रुवाचून 
गुलाब नाही 
   असावयाचा. 

: गुलाब 
: हिमरेषा 
: कुसुमाग्रज 

Monday, November 21, 2016

आशंका

आषाढाची आठवण 
     अश्विनाला उरेल का ?
निलातील मेघयात्रा 
     निरभ्राला स्मरेल का ?

पर्जन्यात हारपली 
     नक्षत्रांच्या संगे रात 
तिची व्यथा हंसपंखी 
     चांदण्यात कळेल का ?

तिन्ही सांजा धुक्यावर 
     लिहिलेले दवगीत 
त्याचा स्वर प्रकाशाच्या 
     गर्जनेशी मिळेल का ?

: आशंका 
: हिमरेषा 
: कुसुमाग्रज 

वरदान

या प्रेमाला दूरपणाचे 
   कायमचे वरदान असे 
समीपतेचा काच न याला 
   मलीनतेचा शाप नसे 
   इथे न केव्हा तुफान उठते 
     धुसमुसणारे 
   धुके न पडते अथवा जीवन 
     आकसणारे 
हलके हलके रक्त पिणारा 
   विद्ध इथे अभिमान नसे 
प्रेम असे पण त्या प्रेमासह 
   जहराचे अनुपान नसे. 

: वरदान 
: हिमरेषा 
: कुसुमाग्रज 

जागा

पुन्हा पुन्हा बघ तुला सांगतो 
पीटामध्ये मी आहे बसलो 
तयार तेथे बसावया तू ?
म्हणशिल ना तर आम्ही फसलो !

: जागा 
: हिमरेषा 
: कुसुमाग्रज 

Tuesday, November 15, 2016

कोसा कोसा लगता है

कोसा कोसा लगता है 
तेरा भरोसा लगता है 

रातने अपनी थालीमें 
चांद परोसा लगता है 

गमसे इतना उन्स हुआ 
पाला पोसा लगता है 

गालपे आसू हाथ तेरा 
ओठंपे बोसा लगता है 
... तेरा भरोसा लगता है 

: गुलज़ार 

Monday, November 14, 2016

देणगी

तुझ्या सावलीत 
विसावला जीव 
उमले राजीव 
    चांदण्यात 
युगायुगांची रे 
मावळे झाकळ 
हृदयी उजळ 
    काही भासे 
आकाशाची फुले 
शृंगारात रात 
आली अंधारात 
    माझ्याकडे 
अंतरीचे गूढ 
उकलले धागे 
जीवित हो जागे 
    थरारोनी 
धुक्यातून नादे 
पैंजणाचा रव 
स्वप्नाशांचा नव 
    जमे मेळा 
तुझ्या स्पर्शे झाले 
गंजलेले क्षण 
सुवर्णाचे  कण 
    जादूगारा !
पाखरांच्या परी 
गीत आलापीत 
गेले झंकारीत 
    जीवनास !
जीवनच सारे 
मुखरीत झाले 
अणुरेणू न्हाले 
    संगीतात !
आणि आज पुन्हां 
अज्ञातात जाशी 
उरे माझ्यापाशी 
    देणगी ही 
तर्जनी हो दूर 
तरी वीणेवर 
राहतील स्वर
    रेंगाळत !

: देणगी 
: किनारा 
: कुसुमाग्रज