Wednesday, September 28, 2016

घडी

ओथंबून आलेले पावसाळी आभाळ ,
घननीळ सावल्यांनी धुंदावलेला माळ,
काहूरभरला व्याकुळ वारा 
मनोमनीच्या छेडतो तारा ,
उलगडते जवळची आभाळी शाल ,
काठावर केवळ मनस्वी फुलमाळ ... 
डोळ्यांतले सारें मानेवर टिपते ,
घडी घालून बाजूला ठेवते . 

: घडी 
: चित्कळा 
: इंदिरा संत 

Friday, September 16, 2016

किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से

किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से 
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है
जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके 
जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं
कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़
जिनपर अब कोई मानी नहीं उगते
जबां पर जो ज़ायका आता था जो सफ़ा पलटने का
अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे!!